ईको फेमिनिज्म (पारिस्थितिकीय नारीवाद): साहित्य और समाज
Keywords:
साहित्य, पर्यावरण, स्त्री, उपन्यासAbstract
हिंदी साहित्य सदियों से चली आ रही साहित्यिक कार्यों की एक समृद्ध परंपरा है, जो समाज, संस्कृति और मनुष्य के बीच एक गहरा संबंध स्थापित करती है। यह शोध आलेख चयनित हिंदी उपन्यासों में उपस्थित eco feminism यानी कि पर्यावरण और स्त्री के मध्य अंतरसंबंध और उससे जुड़ी समस्या का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारत में मौजूद आधुनिक सभ्यता; जो आजकल पूंजीवादी और सामंतवादी व्यवस्था के गठजोड़ का मिला-जुला स्वरूप है, उसके आगमन ने मनुष्य को आधुनिक सुख-सुविधा के साधन तो उपलब्ध कराए; मगर उसने उसे प्रकृति से भी दूर कर दिया है। परिणामस्वरूप उसकी लालसापूर्ण प्रवृत्ति ने उसे उसकी मानवीय नैतिकता से भी दूर कर दिया है। वर्तमान पूंजीवादी दौर में जहाँ अर्थ मनुष्य के आपसी रिश्तों के साथ-साथ प्राकृतिक घटकों के मूल्य निर्धारण का पैमाना बन गया हो; वहाँ उसके संवेदना पक्ष का भी ह्रास होता जा रहा है। आज मनुष्य का मनुष्य से अलगाव, जिससे वह अपनी मनुष्यता खोता जा रहा है और आदिम अमानुषिक भाव की ओर पुनः बढ़ रहा है, ऐसे समय में साहित्य का दायित्व और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। वर्तमान में प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन बढ़ता जा रहा है, मगर उससे उत्पादित वस्तुओं का इस्तेमाल कौन कर रहा है? आज जितनी आबादी है उससे अधिक संसाधन उपलब्ध हैं, परंतु उनका वितरण समान रूप से नहीं हो रहा है। आज भी स्त्री, दलित, आदिवासियों को उनके मूलभूत अधिकार प्राप्त नहीं है तो इसमें किसी खास वर्ग, लिंग, जाति या समुदाय के आधिपत्य का ही प्रभाव है, जो सदियों चले आ रहे अपने विशेषाधिकारों को नहीं त्यागना चाहता है। आदिवासी समुदाय को उनकी ही जमीन से निष्कासित कर उनकी जमीन का इस्तेमाल किसी धनाड्य वर्ग की आधारभूत जरूरतों से लेकर उनकी शानो-शौकत को पूरा करने के लिए किया जा रहा है। चयनित उपन्यासों में उस तथाकथित मुख्यधारा का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार जो पूंजीवादी संस्कृति के साथ मिलकर इन हाशिये पर स्थित आदिवासियों को जबरन विस्थापित करने पर मजबूर करती है; उनसे आदिवासी वर्ग अपना प्रतिरोध व्यक्त करता है और एक सामाजिक आंदोलन छेड़ देता है, जिसमें जल-जंगल-जमीन बचाओ की अनुगूँज सुनाई देती है। इन आंदोलनों में स्त्रियों का प्रमुख योगदान रहता है। इस आलेख में वर्तमान सदी के कुछ चयनित हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त आदिवासी स्त्रियों की स्थिति, जीवन के दैनिक संघर्षों के साथ ही उनके सशक्त प्रतिरोध और अभिव्यक्ति को वर्णित किया गया है। इसलिए हम इसी संदर्भ में उपन्यासों के माध्यम से स्त्री और पर्यावरणीय संबंधों को eco feminism के नजरिए से देखने का प्रयत्न करेंगे।
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