“21वीं सदी की उर्दू तथा हिंदी ग़ज़लों में जन प्रतिरोध का स्वर

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Keywords:

इक्कीसवीं सदी, हिंदी ग़ज़ल,, पारस्परिक प्रेम, सहानुभूति, अंतर्विरोधों, विषमताओं, औद्योगिकी, प्रौद्योगिकी, साम्प्रदायिकता, सामाजिक सद्भावना का अभाव, नक्सलवाद, आतंकवाद

Abstract

समसामयिक परिवेश के प्रति जागरूकता तथा समकालीन समाज के जन-जीवन की यथार्थ पीड़ा को वाणी प्रदान करने की ललक से साहित्य कभी अछूता नहीं रहा है। वर्तमान समय में व्याप्त अंतर्विरोधों तथा विषमताओं को नवीन शिल्पगत संरचना के साथ अभिव्यंजित करने का कार्य 21वीं सदी के हिंदी ग़ज़लकारों ने किया। 21वीं सदी की पृष्ठभूमि पर यदि विचार किया जाये तो ज्ञात होता है कि यह आधुनिक विचारों, त्वरित परिवर्तनों तथा औद्योगिकी से प्रौद्योगिकी की  प्रस्थान सदी है। 20वीं सदी के अंतिम दशक में सोवियत संघ का विघटन, मंडल आयोग की राजनीति, बाबरी विध्वंस, इंटरनेट का उद्भव, सूचना-क्रान्ति के विस्तार ने समय तथा समाज में नवीन एवं विलक्षण प्रवृत्ति को जन्म दिया। स्वतंत्रता के लगभग 79 वर्षों की दीर्घ यात्रा के बाद भी आज इस वैज्ञानिक युग में नैतिकता के बदलते मानदंड, जीवन जीने के परिवर्तित ढंग के कारण मानवीय मूल्यों का ह्रास, बढती साम्प्रदायिकता, सामाजिक सद्भावना का अभाव, नक्सलवाद, आतंकवाद, जड़ होती रूढ़िवादी मान्यताओं के प्रति निषेधात्मक प्रवृत्ति की अनुभवशील अभिव्यक्ति 21वीं सदी की उर्दू- हिंदी ग़ज़लों में परिलक्षित होती है।

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सन्दर्भ सूची-

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Published

2026-07-25

How to Cite

“21वीं सदी की उर्दू तथा हिंदी ग़ज़लों में जन प्रतिरोध का स्वर”. (2026). International Journal of Advanced Multidisciplinary Research in Social Sciences and Humanities, 1(1). https://ijamrssh.org/index.php/ojs3/article/view/8

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